तुम्हारे लिये मैं उस अखबार जैसा था
जिसे तुम रोज़ हाथ में लेती थी..
अपने हाथों से मुझे
कभी उलटती थी
कभी पलटती थी
कभी आंख भर के
निहारती थी
और फिर समेटकर
वापस रख देती थी...
हाँ... मैं कुछ कुछ
उस अखबार जैसा ही तो हूं,
जब तक साथ रही तुम
मुझे उलटती, पलटती
और समेटती रही..
फिर एक दिन
आंधी आई
और तुम बिना मुझे समेटे,
मेरे ऊपर बिना कोई वज़न रखे चली गई
अब मैं ठहरा अखबार
तुम्हारे जाते ही मेरी ज़िंदगी
उस आंधी में
पन्ने दर पन्ने उड़ती चली गई..
आज अरसे बाद
बमुश्किल खु़द के पन्ने समेट पाया हूं..
फुरसत मे
खुद के ही पन्ने पढ़ने की कोशिश की
तो पाया कि बस
अखबार के
अंदर के पन्नो की ही खबरें बदली हैं
पहले पन्ने पर आज भी ...तुम्हारी तस्वीर छपी है
["आज की ताज़ा ख़बर" राहुल द्वारा लिखी "ख्यालात" संग्रह की कविता है. और पढ़ने के लिए देखें Khayalat ]
Picture credits: Arshile Gorky, Untitled , around 1938, Abstract expressionism

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