साँवले होठों वाली: एक सिगरेट से ज़्यादा कुछ थी ही नहीं

By TheBlueEyedSon


माचिस की तीली से
जब चाहा सुलगाया
फूकते रहे
होठों बीच लगाते-हटाते
कभी आधी जलाया
कभी यूँ ही बुझाया
थाम कर ख़्वाहिशें
धुएं संग उड़ाया
एक सिगरेट से ज़्यादा
कुछ थी ही नहीं

जानते थे तुम
अच्छी नहीं मैं
जमती जाउंगी
गहरी काली रेत जैसी
फिर भी काली स्याही से
कुछ बनाते रहे
कहते  रहे अच्छा है ये कालापन
दर्द, दोस्त, हमदर्द
मिटाते मोम वाले रिश्ते
बेदर्द फरिश्ते!
मैं चुपचाप साथ रिसती
यूँ ही मिटती
तुम नज़्म सुनाते
गुनगुनाते
उन बोलो में
मेरा जिक्र नहीं
एक सिगरेट से ज़्यादा
कुछ थी ही नहीं

आदत बन आई तो
कहते हो पीना ठीक नहीं
जल जल कर जीना
ऐसे जीना ठीक नहीं
दूरियाँ बनाते हो
मुद्दत से जलाते नहीं
एक सिगरेट से ज़्यादा
कुछ थी ही नहीं

...या बस एक लत

जो छोड़नी थी
सो छूट गई

["एक सिगरेट से ज़्यादा कुछ थी ही नहीं" लामया द्वारा लिखी "साँवले होठों वाली" संग्रह की कविता है. और पढ़ने के लिए देखें saanwale hothon wali ]

Picture Credits: Man and Woman, Edvard Munch, Expressionism

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