ख्यालात: जंगली हूं, जंगली रहने दो...

By TheBlueEyedSon
लोगों को शायद पता नहीं..
जंगली घोड़े की नाक मे
नकेल डालने की कोशिश
नहीं करनी चाहिये....

वो तुम्हारे बनाए
दायरे के हिसाब से नहीं दौड़ेगा..
उसका अलग हिसाब किताब है..

जंगली घोड़े से
बस दोस्ती करनी चाहिये
जहां मालिक बनने की कोशिश की
वो लात मारेगा,
और यकीन मानो,
ज़बरदस्त लात मारेगा

और फिर जब वो लात मारेगा
तो तुम
दुनिया से कहते फिरोगे के
घोड़ा साला पगला गया है..
एक बार भी ये नहीं कहोगे के
तुमने उसे
अपना ग़ुलाम बनाने की कोशिश की..

अब भी वक़्त है,
इस बात को समझ लो
तुम दुनिया के तौर तरीके में फंसे हो
समाज की सोच के ग़ुलाम हो
और वो ज़ंगली घोड़ा है
तुम से
तुम्हारे समाज से परे है..

जब जब
नकेल पहनाने की कोशिश करोगे
लात ही खाओगे...
और यकीन मानो,
ज़बरदस्त लात खाओगे

अगली बार ज़ंगली घोड़े को
अपने मतलब के लिये
इंसानो की रेस में दौड़ाना हो
तो उसके उपर
नकेल डालने की
कोशिश मत करना

बस उसके कान में
प्यार से जाके बोलना..

`मैं तुम्हारा दोस्त हूं..
 थोड़ी मदद चाहिये`
यकीन मानो..
एक बेलगाम, जंगली घोड़े से ज्यादा वफादार
कोई नहीं होता..

["जंगली हूं, जंगली रहने दो..." राहुल द्वारा लिखी "ख्यालात" संग्रह की कविता है. और पढ़ने के लिए देखें  Khayalat ] 
Image Credit: Galloping Horses, Edvard Munch, Expressionism, 1912, cropped from source http://www.edvardmunch.org/galloping-horse.jsp 

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