The urban legend worth believing [ Things that make your day, as the name suggests are a series of short blogs that will be a celebrati...
By TheBlueEyedSon
कोई खास वजह नहीं है..
फिर भी ना जाने क्यूं
पिछले कुछ दिनो से
रह रह कर,
अपने बचपन वाले घर में
कुछ वक़्त बिताने का
दिल कर रहा है..
मेरा वो घर,
जो मैं खुद अपने हांथों से बनाता था..
दो तकिये पापा के,
जिनसे दाँयी दीवार बनती थी
और दो तकिये दादाजी के,
जिनसे बाँयी दीवार बनती थी...
और मां के तकिये से
वो कोना बनता था
जिस तरफ सर रख कर
मैं बेफिक्री से सो जाया करता था
छत, यूं तो मां के आंचल से
ढली होती थी..
पर जिस दिन डर ज्यादा होता था
उस दिन उस छत पर
मां के आंचल के साथ साथ
पापा की लुंगी
और दादाजी की शॉल भी
डाल दिया करता था..
सामने, मुहाने पर
दरवाजा या दीवार नहीं बनाता था..
बस दादाजी की छड़ी रख देता था
मानो,
अब किसी कि औकात नहीं
कि बिना पूछे अंदर आ जाए..
और बस, बन जाता था
मेरे सपनो का वो घर
जहां ना कोई डर था
ना कोई घबराहट...
अब बड़ा हो चला हूं
पर हुं तो इंसान ही..
इसलिये कई बार
परेशानी में सोचने लगता हूं,
के काश...
के काश कहीं से,
बस, एक बार फिर....
पिछले कुछ दिनो से
रह रह कर,
अपने बचपन वाले घर में
कुछ वक़्त बिताने का...
Picture credits: Marc Chagall, Infanzia/Childhood (rotated 90 degree counterclockwise), Style :Expressionism
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