The urban legend worth believing [ Things that make your day, as the name suggests are a series of short blogs that will be a celebrati...
By TheBlueEyedSon
आशा तकिये में छिप रोती
ढूंढ रहे सब सीप में मोती
इस दौर भाग में
एक नवल प्रीत लिखूँ
सोचा, कोई गीत लिखूँ
होड़ है, शोर है
जोड़ है, तोड़ है
गुणा-भाग में
खोया एक राग लिखूँ
मुस्काता एक बाग लिखूँ
पर कलम बेचारा, क्या बतलाता
जो भी लिखता, व्यर्थ ही पाता
धुएें के बाजार में
अनसुनी एक गुहार लिखूँ
कैसे कहो फूहार लिखूँ
माटी है, ये बोल नहीं
हाँ, बातों का मोल नहीं
ऐसे कोलाहल में
सरहद है बेहाल लिखूँ
या विधवा का श्रृंगार लिखूँ
सोचा था एक ख्वाब लिखूँ
साकी और शराब लिखूँ
क्या हार लिखूँ , क्या जीत लिखूँ
उचित नहीं मैं गीत लिखूँ
उचित नहीं मैं गीत लिखूँ
["सोचा, कोई गीत लिखूँ" लामया द्वारा लिखी "साँवले होठों वाली" संग्रह की कविता है. और पढ़ने के लिए देखें saanwale hothon wali ]
Picture Credits: Self Portrait, Oscar Kokoscha, Oil with hand
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