1.

"भकोलवा के बाबूजी राजनीतिबाज आदमी हैं"

भकोलवा…"भकोल" अपने आप में एक शानदार परिचय है…उसपर "भकोलवा"। खैर बात दरअसल यह है कि भकोलवा के बाबूजी राजनीतिबाज आदमी हैं। "हैं-हैं…खी-खी" करके अगर उन्होंने कोई बात शुरू की मतलब हो गया काम…लग गया कोई पेंच। बात रामलीला-पार्टी के रुकने की थी। हर बरस कातिक के महीने में गाँव में "रामलीला" खेली जाती है…सो इस साल भी खेल होना था। पर बात अटक रही थी रुकने को लेकर।

भकोलवा के बाबूजी कह रहे थे- "रामलीला का खेल है कोई ऐरु- गैरु लौंडा-नाच नही"। बात सही है, 15-20 लोग हैं, उनका सामान है…रोज़मर्रा के अलग, खाने-पीने के अलग। उसपर से मेकअप, ड्रेस , तीर-कमान, गदा, टोप...सतहत्तर आइटम। हनुमान जी की पूँछ, लंगोट और गदा से ही एक पेटी बांध जाये… और यहाँ पूरी वानर-सेना की पूँछ। हर साल की तरह इस बार भी कम से कम 6 कमरे चाहिए रामलीला-पार्टी के लिए। तीन-महला "पोखरापाटन घर" में यूँ तो 6 कमरे कोई बड़ी बात नहीं थी…खली पड़े रहते हैं सालों भर। तीतर, बटेर और कबूतरों का घर बना रहता है। सफाई करने वालों की नाक में दम हो जाया करता है कबूतरों की बीट साफ़ करते। पर इस साल मकई की फसल लहलहाई थी और तीन चार कमरों में अनाज रखा हुआ है। भकोलवा के बाबूजी का सवाल यह कि इतना सारा अनाज निकल कर रखा कहाँ जाएगा। बैसाख-जेठ का महीना होता तो एक तिरपाल टांगकर बोरियों में भरकर रख दिया जाता। पर इस कातिक के महीने में ओस लगकर अनाज ख़राब होने का डर है। आखिर "मरड़ जी" के कहने पर ही मामला दुरुस्त हुआ। मरड़ जी… मतलब अनऑफिसिअल "मुखिया" और ख़ज़ांची। उनकी मर्ज़ी और आशीर्वाद के बिना गाँव में कोई बड़ा काम हो पाना असंभव है। रामलीला भी उन्ही की देख-रेख में उनके तीन महला द्वार पर खेल जाएगा। सो, मरड़ जी के कहने पर कमरे खाली किये गए और सारा अनाज "ठाकुरबाड़ी" में एक कोने में रखा गया।
 

2.

सुबह से शामियाना टांगने की मशक्कत चल रही है। "ब्यास जी "… हाँ यही नाम फेमस है उनका क्यूंकि लम्बी जटाओं वाले ब्यास मुनि का रौल करते हैं रामलीला में …तरह-तरह से जुगाड़ में लगे हैं। कभी बांस की बल्ली छोटी पड़ जा रही है तो कभी तिरपाल फट जा रहा है। चार गाली सुनाई है अभी-अभी मरड़ जी ने तिरपाल वाले को। ससुरा चवन्नी तक का हिसाब ले जाता है और तिरपाल का कपड़ा चिरकुट से भी कमज़ोर।

"लो अब ई, ससुरा कुक्कुर भी यहीं पवित्तर करेगा” ब्यास जी ने कुत्ते को डंडे से हांका।

एक तो झुरमुट जैसे कातिक के दिन…फट्ट से उगा और फुस्स से डूबा। आदमी भला काम करे तो कैसे। वैसे मरड़ जी ने कोई कमी नही रख छोड़ी है। बाकायदा अलग से मजदूरों की व्यवस्था की है हर काम के लिए। एक आदमी दिन भर चाय पकोड़ों के लिए चूल्हे पर तैनात है। बस सारा काम निपट जाये जल्दी-जल्दी। गाँव के औरत मर्द बच्चे सब उत्साहित हैं। रामलीला पूरे एक महीने के उत्सव से कम नहीं है। आस-पास के 4 -5 गाँव के लोग भी आएंगे…मथहिया, औराई , सिमरेहा , धूसर , खुटेहरी आदि। 

 
3.

साँझ से ही घरों में आज हर बात की जल्दबाज़ी है। हरेन की बीवी मीठी रोटी बना कर काम निपटा चुकी है।

"भला कौन तितिम्हा करे रोटी-तरकारी बनाने की। बच्चे वैसे भी मीठी रोटी खाकर ज्यादा खुश रहते हैं।" हरेन की बीवी ने तर्क छोड़ा।

रमेसर आज जल्दी आ गया है खेत से। बैलों को इतनी जल्दी सानी-पानी बस साल में कातिक के महीने में ही नसीब होता है। फुलवा की बहु दोपहर से घर सर पे उठाये हुए है। सरियाकर सबको चार बार कह चुकी है, "बेरा डूबने के पहले ही खा पी कर छुट्टी करो वरना ब्यास जी के ढोलक की पहली थाप के बाद मैं नहीं रुकने वाली"

यही हाल कमोबेश हर घर का है। पहला दिन, पहला पाट भला कोई क्यों छोड़े। जिनगी भर तो ऐसे ही काम करते गुजर रही है...एक आधा दिन तोह निकले चैन से। घीसू के तीनो लड़के लालटेन को घेरे किताब घूर रहे हैं। आँख किताब पर और कान शामियाने से आ रही भोंपू की आवाज़ पर लगी है... कब ब्यास जी आरती गाएं और हरी झंडी मिले।

"धींग-ता, धींग-ता, धींग-ता" झुंझलका रात की तरफ बढ़ी और ढ़ोल थाप चारों दिशाओं में लगे भोपुओं से गूंजने लगी।

पहला काण्ड…राम जी का जन्म। औरतें कनेल का फूल दूर से ही स्टेज पर फेंक कर हाथ जोड़ लेती हैं...जै श्री राम। शंख बजा... सियावर रामचन्द्र की जय। बच्चे पूरी ताकत से चिल्ला पड़े.... सियावर रामचन्द्र की जै। लोगों के आने का तांता लगा है। गेट पर आरती लिए ब्यास जी…कोई चार आना, कोइ आठ आना तो कोई एक रुपया दाल कर पंडाल में एंट्री ले रहा है। गाँव की कुछ औरतें और बच्चे जिनके पास चवन्नी का भी जुगाड़ नही है तिरपाल का निचला हिस्सा उठा कर बेटिकट एंट्री ले रहे हैं। पूरा शामियाना खचाखच भरा हुआ है। राम-लल्ला के अल्हड खेलों पर जनता मंत्रमुग्ध हो रही है। ऐसी श्रद्धा, इतना विश्वास कि जैसे साक्षात अयोध्या स्टेज पर उत्तर आया हो और राम जी का बचपन निहार रहें हों।

लो, शंख बजा और पर्दा गिरा... मतलब यह पाट ख़त्म हुआ। माइक लिए "जोकड़" स्टेज पर आ गया। उसके पहनावे को देखकर बच्चे खिलखिलाने लगे। परदे के पीछे अगले पाट की तैयारी चल रही है…तबतक 5-7 सौ आदमी के मनोरंजन की जिम्मेदारी इस जोकड़ की है। बहुत गुणी आदमी है जोकड़वा… क्या मजाल की कोई टस-से-मस हो जाए। तब तक अगला पाट खेलने तैयारी हो जाएगी।

“वकील बाबू की तरफ से 51 रूपये…तहे दिल से वकील बाबू का धन्यवाद"

औराई के वकील बाबू अजुब्बे कैरेक्टर हैं। घर में एक-एक पैसे पर कलह करेंगे पर ऐसे मौकों पर दिल खोलकर बाँटते हैं। अभी दो दिन पहले की बात है… बेटा 1 की जगह 3 साबुन की बट्टी ले आया। सोचा क्यों बार बार भागना …काम तो आना ही है। वकील बाबू बिगड़ गए और वहीँ धुलाई कर दी बेटे की। भगवान जाने की जब रूपये-पैसों की इतनी आमद नही है तो एड़ी अलगा कर बड़ा बनने की क्या जरूरत है।

खैर ... पहला दिन… पहला काण्ड समाप्त।

"पहिला काण्ड सबसे छोटा है … एक्के दिन में समेट दिया" किशना साथ बैठे सुमितवा को बता रहा था।
 

4.

रामलीला पार्टी के लिए दिन का वक़्त आराम करने का और अगली रात की तैयारी करने का होता है। शामियाने के सामने ही मैदान है। राम जी का रौल करने वाला गोपाल, गंजी खोलकर धुप सेंक रहा है। ब्यास जी अभी-अभी नहा कर आये हैं और लम्बी जटाएं सुखा रहे हैं। राधे मोहन उर्फ़ हनुमान जी अपनी पूँछ धो-पोंछ कर सुखा रहा है। हनुमान जी की एंट्री भी जल्दी होने वाली है।

"रे किशना, देखो तो...इहे राजा दशरथ बना था न कल रतिया में?”

"हाँ अउर देखना इहे तीसरे काण्ड में विश्वामित्र बन के फरसा उठा लेगा" किशना अपनी रामायण की नोलेज का धौंस जमा रहा है सुमितवा पर। किशना है तो अभी 8 साल का लेकिन रामायण का एक-एक सीन हज़म कर गया है। क्या मजाल की रामलीला का एक पाट छूट जाये किशना से।

"वो देखो वही गंगवा है…जो कल रतिया में जोकड़ बनके आया था मुह में पॉवडर लपेट के"

गंगा दिखने में हट्टा-कट्टा नौजवान है। कोई देख कर नही कह सकता कि गाँव की एक रामलीला पार्टी में जोकर का काम कर सकता है। पर पेट की खातिर…जोकरगिरी ही सही। खैर, रामलीला बदस्तूर जारी रहा। ताड़िका-वध के दिन तो औरतों और बच्चों का डर के मारे बुरा हाल था। उस रात बिना किसी मरद आदमी को संग लिए कोई घर जाने की हिम्मत भी नही कर रहा था। लंका-दहन…जब हनुमान जी की पूँछ में आग लगाकर स्टेज पर कूदा-फांदी मची होती है बच्चों की किलकारियाँ भोंपू की आवाज़ को भी मंद कर दे रही थी... अब तो खाली युद्ध की घड़ी की प्रतीक्षा थी... जब रावण मरे तभी अटकी सांस अंदर जाएगी...


5.

22वाँ दिन... युद्ध काण्ड…रामलीला अपने आखिरी पड़ाव पर आ चुका था। राम-रावण के महासंग्राम का सब बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। उसके बाद रामचन्द्र जी का राज्याभिषेक। पर अचानक सुबह रामलीला पार्टी में कुछ हलचल दिखाई दी। गाँव के सारे बड़े बुजुर्ग इक्कठे हो गए। भीड़ बढ़ने लगी। गाँव के कुछ जवान हथियारों के साथ निकल आये। पंचायत बैठी…बात यह थी की कल रात से गंगवा गायब था। रामलीला पार्टी के सदस्यों की मानें तो उसका अपहरण हुआ था। क्यूंकि रात तक तो गंगवा स्टेज पर खड़े होकर सबको हंसा रहा था और खाना खा चुकने के बाद तक सबकुछ सामान्य ही था। ऐसी हालत में तो रामलीला होने से रही। मरड़ जी आए और पूछताछ शुरू हुयी। खबर लगी कि ये काम सिमरेहा वालों का है। उन्होंने ही गंगवा का अपहरण किया है।

लफूआ लौंडों की कमी नही है सिमरेहा में …राह चलते लोगों से भी लट्ठम-पट्ठम करते हैं। दिन रात गाँजा-चिल्लम पी कर लफुआई करते फिरते हैं। कोई कहता…गंगवा भी गंजेड़ी है। दिन रात सिमरेहा वालों के साथ उठ-बैठ करता है। कोई कहता…किसी लौंडे ने उससे रंगदारी में रूपये मांगे थे और उसने इंकार कर दिया था। चौंसठ मुंह और सतहत्तर बातें।

अब कारण जो भी हो पर गंगवा की रिहाई जल्दी होनी जरूरी थी। लाठियां निकल आई …तना-तनी शुरू हो गयी। ऐसा लगा आज कुछ बवाल होकर रहेगा। लेकिन फिर बुजुर्गों के हस्तक्षेप से बात शांत हुयी और गंगवा की रिहाई तय हुयी। पूरे 15 घंटे तक हाथ-पाँव बाँध कर गन्ने के खेत में पड़े रहने के बाद गंगवा वापस लौटा। रामलीला पार्टी ने राहत की सांस ली। पर ऐसी घटना के बाद रामलीला बंद हो गयी। लाख समझने पर भी कोई असर नही हुआ और पार्टी तत्काल रवाना हो गयी। "मरड़ जी " भी भला क्या कर सकते थे…बात जान की सुरक्षा की थी। 
 

6.

इस घटना के पीछे कारण क्या था और क्यों गंगवा अपहरण किया गया, यह बात तब किसी पल्ले नहीं पड़ी। आधा-पौना अफवाहें उड़ती रहीं। सबसे अजुब्बा अफ़वाह ये कि सिमरेहा के खतनी साहू की अधपगल सी बेटी कमली, गंगवा से फंस गयी थी। ब्यास जी की पहली ध-तिंग की थाप पर कमली पहुँच जाती रामलीला देखने। इस साल कातिक में भी हाड़ कंपाने वाली ठंढ थी पर क्या मजाल कि नियम से रोज आने वाली कमली की दाँत भी किटकिटाई हो।

“सातवें काण्ड की समाप्ति की रात में भाग कर मंदिर में शादी कर लेंगे… तैयार रहना”, रामलीला के बाद कमली और गंगवा को फुसफुसाते सुना था, ऐसा सिमरेहा वालों का कहना था।

"भाग कर शादी" वह भी रामलीला पार्टी के दो कौड़ी के निमोछिया जवान से…छी-छी। गाँव की बेटी को भला ऐसा कैसे करने दे सकते थे। इसलिए गंगवा का अपहरण करके ठिकाने लगाने का जुगाड़ बिठाया था... कुछ मनचले अलाव के इर्द-गिर्द दबी आवाज़ में कहते सुने गए। सिमरेहा के लौंडे भी कुछहू बकते हैं।

कुछ लोगों की थ्योरी में तो अपहरण हुआ ही नहीं था, "गंगवा पर रामजी की तरह बनवास जाने का भूत सवार था इसलिए खुद ही खेत की तरफ निकल लिया था"। अफवाहें तो गाँवों में तितलियों की तरह उड़ती फिरती हैं। सच तो बस राम जी ही जानते हैं।  

बाकी जो भी हुआ हो हो...दिल तोड़ने वाली बात ये थी कि एक-आध बरस बाद ही रामलीला पार्टी टूट गयी। वे आपस में ही लड़ पड़े। मतलब ये की हमारे गाँव में यह उनका आखिरी शो था और वो भी अधूरा…रावण वध ना हो पाया... जानकी माता सिसकती-सिसकती ही भुला दी गईं...
["रामलीला" सिद्धार्थ द्वारा लिखी कहानी है. और पढ़ने के लिए देखें  Siddharth ] 
Image Credits:  Maqbool Fida Hussain, Hanuman Series, Mythology and Symbolism  http://www.artswithoutborders.com/preview/husain_preview.html 

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