हम बहुत रह चुके यारों, शहरों के कारागारों में,
बसे भीड़ में, धक्के खाते, खड़े रहे कतारों में!
करे घोंसले बहुतेरे, महलो में, परिंदों की भांति 
थोडी देर जियें गरुडो सा, चट्टानों की दरारों में!

उत्तुंग शिखर मुस्काते हैं, जो आनन छूए अंबर का,
शिवलहरी को आमंत्रित करता, ये आवास दिगंबर का;
चिडियों की चें-चें, कर के अंत, चीखेगी चील पहाड़ो की-
और मन को करेगी उत्तेजित, रणकारे शेरदहाडो की!

निकला था नचिकेता यहीं से अमरद्वार तक जाने को,
और युधिष्ठिर, इसी मार्ग से, सदेह स्वर्ग सिधारने को;
बाकी पांडव यहीं गिरे, और गिरा जटायु यहीं कहीं -
लगता है, यह जगह बड़ी पावन है,... प्राण गवाने को!

सुन ली बहुत बड़-बड़, अब ‘जय जय’ के, बोल लगाने हैं ,
सीने में ताज़ा पवन के आलिंगन भर कर लाने है!
अंजलियाँ भर ली नदियों की, अब छूएंगे सावन को 
लांघ लांघ इन शिखरो को, अंबर से हाथ मिलाने हैं।




कवि परिचय :

नीरव एक छोटे शहर में पले-बढे लेखक हैं जिन्हें सुनहरे सपनों से मुहब्बत है ।  वो दिल्ली विश्वविद्यालय (एसएसी) के पूर्व छात्र हैं और वर्तमान में केपीएमजी ग्लोबल सर्विसेज में कार्यरत हैं। वो 'वर्क हार्ड - प्ले हार्ड' दर्शन के साथ अपना जीवन जीते हैं- पढ़ते हैं, लिखते हैं और यात्रा करते हैं। उनके लेखन में भारतीय पौराणिक कथाएं, शिक्षा और यात्रा शामिल हैं। इसके अलावा वो एक बेहतरीन चित्रकार हैं. 






Picture Credits: Les Alpilles, Mountain Landscape, Vincent van Gogh, Expressionism

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