ये कहानी अधूरी कहानी - वर्टिगो  और  अधूरी कहानी - बायोप्रोडक्ट का तीसरा हिस्सा है. मुहब्बत की कहानियाँ महाजन के ब्याज की तरह होती हैं. किश्तों में लिखते रहो, सूद चुकाते रहो।  मूल कभी नहीं कमेगा। मूल चुकाने के लिए सब कुछ बेचना पड़ता है।  

वो दिन पतझड़ के दिन थे। वो दिन, दिन भर गर्म हवाओं वाले दिन थे। वो दिन लड़के की तरह बौराये हुए दिन भी थे। वो दिन लड़कीऔर लड़के के बीच झड़प के दिन थे। वो दिन लड़के के चिल्लाने और लड़की के रोने के दिन थे। वो दिन लड़की को जबरन बुलाकर मिलने के दिन थे। वैसे लड़के ने आजतक जबरन कभी कुछ न किया था न किसी को मजबूर करता था। लड़का हमेशा आजादी की बातें करता था।पर्सनल लिबरेशन की बातें करता था। लड़की हमेशा लड़के से कहती थी "तुम्हारी यही बात मुझे सबसे अच्छी लगती है। तुम कभी कुछ जबरदस्ती करने को नहीं कहते मुझसे। यू गिव मी माई पर्सनल स्पेस। "
"मसलन ?"
"मसलन प्यार वाला मुद्दा ही ले लो। मैं तुम्हे कभी "आई लव यू" नहीं कहती क्यूंकि मुझे खुद नहीं पता मैं तुम्हें प्यार करती भी हूँ या नहीं, और तुम इस बात का कभी बुरा नहीं मानते। "
लड़के ने बस हामी भरी। अमूमन ऐसे मौकों पर लड़का अपने आप को औरों से अलग जानकार गौरवान्वित महसूस करता था और लड़की का हाथ पकड़ कर लगभग हथेली रगड़ते हुए "आई लव यू " कहता था पर अब बस हामी से काम चलने लगा। क्यों… पता नहीं। लड़की ने कभी पूछा नहीं...लड़के ने कभी बताया नहीं। हालाँकि लड़की ये सारी बातें नोटिस करती रहती थी पर कुछ कहती नहीं थी। ये लड़की के साथ मसला था। वो ज्यादा दिखाती नहीं थी कि उसे लड़के की फिक्र है। मन ही मन वो फिक्र करती भी थी शायद, पर जाहिर नहीं करती थी। शुरुआत के दिनों में लड़का उससे ऐसी कोई उम्मीद रखता भी नहीं था, पर अब बात कुछ और थी। पहली बार लड़के को उसकी जरूरत थी।
उन दिनों लड़की, लड़के में बहुत सारे बदलाव लाना चाहती थी। मसलन पहले कभी भी लड़की ने लड़के की शारीरिक बनावट का जिक्र नहीं किया था पर अब वो हमेशा उसे मोटे होने की हिदायत देती रहती थी।
लड़का कहता " अगर मैं मोटा नहीं हुआ तो क्या तुम मुझे प्यार नहीं करोगी ?"
"प्यार तो मैं तुम्हे वैसे भी नहीं करती…हा हा हा " ये कहते हुए लड़की ने अपने दोनों हाथों और चेहरे से शैतान जैसी शक्ल बनायी। लड़के का मन हुआ की चूम ही ले उसे। पता नहीं क्यों लड़के को हर बात के अंत में लड़की को चूमने का मन करता था। चाहे बात हंसी की हो या नाराज़गी की, काम की हो या कविता की, बात लड़के की उदासी की हो या लड़की की ख़ुशी की हर बात के अंत में लड़की को चूम लेने की इक्षा होती थी। और फिर कुछ भी न कहने की इक्षा होती थी। फिर भी लड़की द्वारा उसकी हर बात समझ जाने की इक्षा होती थी।हलांकि लड़की भी कुछ ऐसी ही अपेक्षा रखती थी पर उसकी अपेक्षा में पहले लड़के को चूमने की इक्षा शामिल नहीं थी। शायद दोनों में इतना ही फर्क था।
"आई वांट योर शोल्डर्स टू बी ब्रॉड...लाइक दिस " और ऐसा कहते हुए लड़की ने लड़के के कन्धों को दो अलग दिशाओं में खींचा जैसे चुइंगम खींच रही हो। अपने कन्धों को चुइंगम से तुलना करना लड़के को खासा अनहाईजीनिक सा लगा। पर अब उसके पास अच्छे उपमानों की कमी होने लगी थी। लड़के को अचानक से कॉलेज याद आ गया। उसका कॉलेज पहाड़ों में था। कभी-कभी उसे लगता की पहाड़ उसके कॉलेज में है। कौन सी चीज़ किसमें थी लड़का अंदाजा नही लगा पता था। वो कहा करता था "मेरी लम्बाई कम है पर शोल्डर ब्रॉड है क्यूंकि मेरे कन्धों पे जिम्मेदारी बहुत है।"

लड़की ने जैसे उसके कंधों को खींचते हुए अपनी बात पूरी की लड़के को लगा अचानक से उसकी सारी जिम्मेदारियां ख़त्म हो गयीं हैं। उसने अपनी लम्बी टांगों की तरफ गौर से देखा। लड़के को लगा उसे तेज़ भागना है। तभी उसे बिंडौआ याद आ गया, "बिंडौआ...मुझे बिंडौआ से बहुत डर लगता है। जून-जुलाई की खालिस दोपहरी में परती खेतों में बिंडौआ उड़ा करते थे...धूल के भंवर। खेत में पड़ी हर चीज़ गोल गोल घूमती हुई आकाश की ओर उपर उड़ने लगती थी।" लड़के को लगा वो उसी बिंडौआ के बीचों बीच खड़ा है। 
लड़की ने लड़के को खोते हुए और बे सिर पैर की बात करते हुए देखकर बात बदली "आई जस्ट लभ सीसीडी कॉफी. अगर किसी और शहर में गयी जहाँ ये न हो तो कैसे ही रहूंगी मैं?"लड़का झुंझलाकर बोला "मुझे अपने कॉलेज के ढाबे का चाय बहुत पसंद है। पर पिछले ५ साल से उसके बिना भी मैं रह ही रहा हूँ ना। प्यार और मजबूरी सबकुछ सिखा देती है।" लड़की ने अब चुप रहना ही उचित समझा।
इन दिनों लड़की बातें इतनी तेजी से बदलने लगी थी कि एक दिन उसने अपने आप को किसी और लड़की से बदल दिया और कहा, "तुम मुझे छोड़ दो, खुश रहोगे। मैं तुम्हें कभी खुश नहीं रख पाऊँगी। तुम्हें हमेशा मुझसे शिकायत रहती है।"
लड़के को अजीब सा लगा। अचानक से इतना बड़ा बदलाव ? पर फिर उसे कुछ भी नहीं लगा। नेपथ्य में देखकर बड़बड़ाता रहा
"मुझे बदलाव से डर लगता है। नए साल पर कैलेंडर बदल जाने पर जनवरी मैं तारीख नहीं देख पता। इस तरह मेरी उम्र हर बदलते साल के साथ १३ महीने कम हो जाती है। एक बार बरसात का मौसम बदलकर सर्दी बन गया। मैं पूरी सर्दियाँ रोज़ नहाता रहा जैसे बारिश में रोज़ भीगता था। वैसे तुम्हें तो पता ही है मुझे नहाना कुछ खास पसंद नहीं है।"
लड़के की बे सिर पैर की बातें सुनकर लड़की ने झल्लाते हुए कहा," मैं तुमसे कुछ ज़रूरी बात कह रही हूँ...सुन भी रहे हो तुम ?"

"तुमने मेरी आखिरी कविता सुनी?"

प्यार में दर्द होता है
हमेशा ही ऐसा क्यों होता है ?
दो रूहों के बनते रिश्तों में
अविश्वास और शक क्यों आता है ?
और जब यही हमेशा होता है तो
प्यार जैसी शै बनी ही क्यों है ?

लड़के ने अपनी नयी कविता सुनाई। कविता क्या थी एक कहानी थी और एक मुकम्मल सवाल भी। लड़की शायद नहीं समझेगी। समझ गयी तो ज़ाहिर नहीं करेगी और अगर ज़ाहिर किया तो भी कोई मतलब नहीं निकालेगी। इसलिए उसने गानों की बात करनी शुरू कर दी।
"पता है मोहम्मद रफ़ी मेरे पसंदीदा गायक हैं। ये अलग बात है की आजकल मैं उन्हें ज्यादा सुनता नहीं। बहुत पहले मुझे किशोर कुमार पसंद थे। मैं लड़ पड़ता था लोगों से अपनी बात सही साबित करने के लिए कि, किशोर कुमार रफ़ी से ज्यादा अच्छे गायक हैं। ख़ैर अब तो मैं किसी को कुछ भी साबित करने के लिए नहीं लड़ता। सबकी अपनी मर्ज़ी है। एक दिन अचानक से मुझे अल्ताफ राजा पसंद आने लगे। लगा ये है असली देशी गायक। युवाओं की असली नब्ज़ पकड़ने वाला, "तुम तो ठहरे परदेशी साथ क्या निभाओगे ?"
बस इतना सुनते ही लड़की भड़क उठी,
"हाँ मैं कभीं तुम्हारा साथ नहीं निभा पाऊँगी। तब से यही कह रही हूं मैं।"
"पर मैंने तो बस उनका सबसे मशहूर गाना सुनाया तुम्हें "लड़का शांत भाव से बस जवाब दे रहा था।
"मुझे सब पता है तुम हमेशा दिल्ली को परदेश कहते हो। तुम्हारी रग-रग से वाकिफ़ हूँ मैं। गो फ्रॉम हियर। "
लड़के को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। लड़की को एक और बार समझाए ,उसके गालों को एक और बार चूमे ,उसकी बड़ी नाक एक और बार हिलाये, उसका हाथ दबाकर एक और बार पागल कहे या फिर खुद को ही समझा ले जाये। आखिर में उसने कुछ भी नहीं किया।
"मैने कहा था तुम एक दिन सबकुछ ..." बस इतना कहके चुप हो गया।
सबकुछ गड्डमगड्ड सा था। कुछ कह पाना मुश्किल था कि किसने क्या किया, क्या नहीं किया और क्या कर सकता था। उफ़!

वो चला गया। पहाड़ों से निकल कर उसके शहर में आया था फिर पहाड़ों में वापस चला गया। कब तक, कहाँ तक ये या तो अब साफ़ पानी वाली नदी बता सकती थी या फिर हरे पत्तों वाला पहाड़।

और हाँ, पूनम का चाँद भी जो उसके साथ-साथ दूर तक चला आया था...



उपसंहार : अव्वल तो इसे कहानी  समझा जाए। क्यूंकि हो  सकता है पढ़ते हुए ये कहानी एक नज़्म सी लगे ।  कभी-कभी अफ़सानों में बहते-बहते पूर्णविराम, अर्धविराम की शक्ल लेने लगते हैं  और फिर अफ़साना नज़्म बन जाया करता है ।  फिर यह भी हो सकता है कि पढ़ने के बाद यह रचना दोनों में से कुछ भी न लगे । अब एक ऐसी रचना जो किसी ढांचे में ना बांधी जा सके और उसपर भी अधूरी हो तो यह जरा अजीब सा है। इसलिए जिस अधूरेपन को पूरी कहानी  में बांटना है वो इस एक शेर में मुकम्मल है :
एक अरसा लगा जिसे ढूँढ़ते ज़माने की भीड़ में 
सफ़हा सफ़हा खो रहा हूँ उसे अपनी तहरीर में 

["अधूरी कहानी - च्युइंग गम" सिद्धार्थ द्वारा लिखी कहानी है. और पढ़ने के लिए देखें Siddharth

Image Credit: Separation, Edvard Munch, Expressionism

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